नशीले जहर में गर�?क होते लोग
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अभिषेक क�?मार सिंह; पहली वजह यह है कि वे ज�?यादातर अव�?यावहारिक होते हैं और दूसरी वजह है कि सरकारें इस समस�?या को तात�?कालिक नजरि�? से देखती हैं, दीर�?घकालिक नजरि�? से नहीं। शराबबंदी की सबसे अहम अव�?यावहारिकता यही है कि इसमें कमजोर वर�?ग और निचले तबके के उन लोगों की समस�?याओं को नजरअंदाज किया गया है, जिनके लि�? शराब �?क राहत का काम करती है।
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गांव-देहात, उपेक�?षित पिछड़े इलाकों और सीमांत द�?र�?गम जंगली क�?षेत�?रों में बनी जहरीली अवैध, सस�?ती शराब पीने वाले अनगिनत लोग गाहे-बगाहे अस�?पताल पह�?ंचते रहते हैं। जिन पर इसके जहर का ज�?यादा असर होता है, वे तो अस�?पताल की देहरी भी नहीं छू पाते। मगर अवैध शराब की बिक�?री रोकने को लेकर शासन-प�?रशासन का रवैया हर जगह कमोबेश �?क जैसा है।
किसी बड़ी घटना के बाद चंद दिनों तक सरकार की सख�?ती इस रूप में दिखाई देती है कि मरने वालों के परिजनों को म�?आवजे के तौर पर क�?छ रकम थमा दी जाती है। अवैध शराब भट�?टियों की तोड़फोड़ और इक�?का-द�?क�?का शराब माफिया की गिरफ�?तारियों की रस�?मी कवायद के बाद �?क बार फिर किसी और जगह यह किस�?सा दोहरा�? जाने तक पूरा तंत�?र पहले की तरह सो जाता है।
अहम सवाल यह है कि जहरीली शराब के �?से हादसे अक�?सर देश के पिछÞड़े और उपेक�?षित इलाकों में ही क�?यों होते हैं? गरीब-मजदूर तबका ही इसका शिकार क�?यों बनता है? इसका �?क आसान जवाब तो हर कोई जानता है कि सरकारी ठेकों के बजाय सामान�?य परचून की द�?कानों और ढाबों आदि पर बिकने वाली �?सी देसी शराब की ग�?णवत�?ता जांचने का चलन अपने देश में नहीं है। यह धंधा प�?लिस और आबकारी विभाग की मिलीभगत से चलने वाले शराब माफिया के लंबे-चौड़े नेटवर�?क की देन है।
मगर इसकी निगरानी से ज�?ड़े तंत�?र का हर प�?र�?जा इसे देखकर भी तब तक अनजान बना रहता है, जब तक कि कोई बड़ा हादसा न हो जा�?। आखिर यह माफिया बिहार जैसे शराबबंदी वाले राज�?यों के बड़े इलाके में भी लोगों को सस�?ती शराब कहां से और कैसे म�?हैया करा पाता है। साफ है कि प�?लिस और आबकारी विभाग के कारिंदों की रिश�?वतखोरी और पैसे-रसूख के बल पर हासिल राजनीतिक संरक�?षण के चलते यह नेटवर�?क जैसे चाहे, जहां चाहे शराब खपाने में समर�?थ है। क�?या सरकारों ने कभी इस सवाल पर विचार किया है कि सस�?ती शराब के जहर का शिकार �?�?ग�?गी-�?ोपड़ी में रहने वाला मजदूर-गरीब तबका ही क�?यों होता है?
चूंकि गरीब की ही शराब जहरीली होती है, लिहाजा क�?छ दिनों तक �?सी घटनाओं पर मातमप�?र�?सी के लि�? तंत�?र की लापरवाही, शराब माफियाओं की ऊंची पह�?ंच और उसके लालच का जिक�?र होता है, जो शराब में मेथेनाल की जानलेवा मिलावट कर अपना म�?नाफा ब�?ाना चाहता है। आम लोग भी �?सी घटनाओं पर अक�?सर �?सी उपदेशात�?मक टीका-टिप�?पणी करके खामोश हो जाते हैं कि ये बेचारे लोग क�?यों शराब पीना छोड़ नहीं देते या सरकारी ठेके पर कतार में लग कर महंगी शराब क�?यों नहीं खरीदते। या फिर ‘पीओगे, तो मरोगे’ ही। जबकि बात इस म�?द�?दे पर होनी चाहि�? कि �?क उपभोक�?ता के रूप में गरीबों को भी कम कीमत वाली, लेकिन स�?रक�?षित और म�?हरबंद शराब खरीदने और उसके सेवन का हक है।
गौरतलब है कि पश�?चिमी देशों में तमाम उपभोक�?ता वस�?त�?ओं की तरह शराब भी �?क उत�?पाद है, लिहाजा वहां इसकी ग�?णवत�?ता, कीमत आदि की निगरानी खानपान की दूसरी वस�?त�?ओं की तरह होती है। जबकि हमारे देश में सरकारें इसे सामाजिक नैतिकता से जोड़ कर देखती हैं। बिहार में वर�?ष 2016 में घोषित की गई और अब तक लागू शराबबंदी के पीछे यही नैतिकतावाद का फलसफा नहीं, तो और क�?या था!
विडंबना है कि हमारा समाज भी इससे होने वाले हादसों को देख कर �?क द�?वंद�?व में फंस जाता है और पूर�?ण शराबबंदी जैसे उपायों की मांग कर बैठता है। यही वजह है कि देश के कई हिस�?सों में शराबबंदी को लेकर महिलाओं तक ने आंदोलन चला�? और इनके असर से ग�?जरात, बिहार, मिजोरम, नगालैंड, मणिप�?र और लक�?षद�?वीप में सरकारों ने शराबबंदी कर रखी है। पर इसकी �?क सच�?चाई यह है कि तमाम प�?रतिबंधों के बावजूद हमारे समाज में आध�?निकता के नाम पर शराब की स�?वीकार�?यता ब�?ी है।
वर�?ष 2019 में केंद�?र सरकार के सामाजिक न�?याय �?वं अधिकारिता मंत�?रालय और दिल�?ली के अखिल भारतीय आय�?र�?विज�?ञान संस�?थान (�?म�?स) द�?वारा 186 जिलों में दो लाख से ज�?यादा घरों में करा�? ग�? सा�?ा सर�?वे में पता चला था कि देश में शराब का सेवन करने वालों की संख�?या सोलह करोड़ है। शराब पीने वाले दस से पचहत�?तर साल आय�? वर�?ग के �?से लोगों का प�?रतिशत 14.6 निकलता है, जो साबित करता है कि अगर लोगों को वैध ढंग से सस�?ती और ग�?णवत�?ता वाली म�?हरबंद शराब मिले तो इससे होने वाले हादसों में उल�?लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
असल में, शराबबंदी के प�?रयास और �?से संकल�?प व�?यावहारिक समस�?याओं के कारण ज�?यादा नहीं टिक पाते हैं, जिससे समस�?या�?ं जस की तस बनी रहती हैं। यहां उल�?लेखनीय है कि पाबंदी के बावजूद बिहार में राज�?य आबकारी निगम के तहत बनाई और बेची जाने वाली विदेशी किस�?म की शराब छूट के दायरे में है। इससे यह मत बनता है कि सामाजिक रूप से देसी शराब ही ज�?यादा न�?कसान की वजह बनती रही है। निस�?संदेह आर�?थिक रूप से कमजोर तबके के लोग सस�?ते में मिलने वाली देसी शराब का सेवन करते रहे हैं, जिससे पारिवारिक कलह और उनके आर�?थिक न�?कसान जैसी समस�?या�?ं तो पैदा ह�?ई ही हैं, मौतों का आंकड़ा भी काफी रहा है।
यही नहीं, देखा जा रहा है कि जिन राज�?यों में पहले से �?से प�?रतिबंध लागू कि�? ग�? हैं, वहां सीमावर�?ती इलाकों के दूसरे राज�?यों से देसी शराब की निर�?बाध आपूर�?ति होती रही है। ग�?जरात में शराबबंदी लागू है, लेकिन पड़ोसी राज�?य महाराष�?ट�?र से सटे सीमावर�?ती इलाकों में शराब की खपत काफी है। यही समस�?या बिहार में देखने को मिल रही है। नेपाल के अलावा �?ारखंड, पश�?चिम बंगाल और उत�?तर प�?रदेश से सटे सीमाई इलाकों से होने वाली शराब की तस�?करी �?से प�?रतिबंध को बेमानी साबित करती है। इसी तरह रसूख और ऊंचे राजनीति संपर�?कों के बल पर चलती शराब की अवैध भट�?ठियों को बंद कराना �?क बड़ा सिरदर�?द है।
शराब पर प�?रतिबंध के ज�?यादातर उपायों के नाकाम रहने के दो कारण हैं। पहली वजह यह है कि वे ज�?यादातर अव�?यावहारिक होते हैं और दूसरी वजह है कि सरकारें इस समस�?या को तात�?कालिक नजरि�? से देखती हैं, दीर�?घकालिक नजरि�? से नहीं। शराबबंदी की सबसे अहम अव�?यावहारिकता यही है कि इसमें कमजोर वर�?ग और निचले तबके के उन लोगों की समस�?याओं को नजरअंदाज किया गया है, जिनके लि�? शराब �?क राहत का काम करती है।
शहरों-कस�?बों के द�?र�?गंधय�?क�?त मैनहोल साफ करने वाले कर�?मचारी प�?राय: शराब पीकर ही गटर में उतरते हैं, ताकि वे द�?र�?गंध से बच सकें और यह काम कर सकें। उन�?हें शराब पीने से रोका जा सकता है, बशर�?ते उन�?हें द�?र�?गंध से बचाने वाले मास�?क दि�? जा�?ं और इस काम के लि�? अतिरिक�?त मेहनताना मिले। �?से लोगों को अगर शराब वैध तरीकों से नहीं मिलेगी, तो वे इसके लि�? अवैध रास�?ते अपना�?ंगे, जिससे चोरी-छिपे शराब का कारोबार ब�?ेगा और सस�?ती शराब ज�?यादा महंगे दामों में बिकेगी।
इसलि�? लगता है कि शराबबंदी लागू करने और संकल�?प लेने के पीछे परोक�?ष भाव उपदेशात�?मक है, यानी लोग ख�?द शराब छोड़ दें या विदेशी शराब महंगे दामों पर खरीदें। इससे यह लग रहा है कि सिर�?फ गरीबों को शराब से वंचित किया जा रहा है, जबकि अमीरों को विदेशी शराब पहले की तरह आसानी से मिलती रहेगी। दिल�?ली में ख�?ले सरकारी ठेके इसका प�?रतीक हैं।
क�?रेडिट: जनसत�?ता