रिटायर्ड फौजी का निधन, 100 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

राजस्थान। शहीदों और सैनिकों के लिए विख्‍यात झुंझुनूं की धरती ने देश की रक्षा के लिए वीर बहादुर जवान दिए हैं. जिले के सैनिकों ने युद्ध में अपने कौशल का परिचय देते हुए शहादत दी तो बहादुरी के रिकॉर्ड भी अपने नाम किए हैं. लेकिन रिटायर्ड होने के बाद भी कई रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं. उसी में सबसे अधिक समय तक पेंशन लेने का कीर्तिमान भी शामिल है. झुंझुनूं के भोड़की गांव के पूर्व सैनिक बोयतराम डूडी भी वो पूर्व सैनिक थे, जिन्‍होंने तकरीबन 66 साल तक फौज से रिटायर्ड होने के बाद पेंशन ली. लेकिन दुखद कि सोमवार को बोयतराम डूडी का 100 की उम्र में निधन हो गया. बोयतराम डूडी का अंतिम संस्‍कार पैतृक गांव में किया गया.

बोयतराम डूडी ने 100 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. सोमवार को उनका अंतिम संस्‍कार उनके गांव भोड़की में किया गया. बोयतराम संभवतया प्रदेश में एकमात्र पूर्व सैनिक थे जिन्‍होंने रिटायर्ड होने के बाद करीबन 66 साल तक फौज से पेंशन ली. दरअसल, बोयतराम 1957 में रिटायर्ड होकर आए तब उन्‍हें 19 रुपए पेंशन मिलती थी, जो 66 साल बाद बढ़कर 35640 रुपए पहुंच गई थी. अब उनकी धर्मपत्‍नी 92 वर्षीय चंदा देवी सैना के नियमानुसर आजीवन पेंशन लेंगी. बोयतराम के निधन के बाद गांव में शोक की लहर दौड़ गई. उनके अंतिम संस्‍कार में रिश्‍तेदार और काफी संख्‍या में पूर्व सैनिक शामिल हुए और उन्‍हें अंतिम विदाई दी.

झुंझुनूं के भोड़की गांव के रहने वाले पूर्व सैनिक बोयतराम डूडी दूसरे विश्व युद्ध में लड़ चुके थे और छह मोर्चो पर हुई जंग में उनकी बहादुरी के लिए उनको चार सेना मेडल मिले थे. बोयतराम दूसरे विश्व युद्ध की हर बात और किस्‍से परिजनों और लोगों को सुनाया करते थे.उनका जन्म भोड़की में 1923 में हुआ था और वे साढ़े 17 साल की उम्र में सेना में चले गए थे. उनकी पोस्टिंग सेना की राज रिफ बटालियन में हुई थी. इस दौरान दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने पर उनको लीबिया और अफ्रीका के छह मोर्चों पर जंग के लिए भेजा गया था. उन्होंने इस लड़ाई में अभूतपूर्व बहादुरी का परिचय दिया था. उनकी बटालियन के 80 फीसदी सैनिकों के शहीद होने के बाद भी उन्होंने लड़ाई जारी रखी थी. 1957 में सेना से रिटायर्ड होकर आए. उस वक्त उनको 19 रुपए महीना पेंशन मिलती थी. जो अब बढ़कर 35 हजार 450 रुपए हो गई थी. वे जिले के साथ ही प्रदेश और देश के भी सर्वाधिक समय से पेंशन लेने वाले पूर्व सैनिक थे.

परिजन बताते हैं कि बुजुर्ग बोयतराम इस उम्र में भी अपने नित्य काम खुद करने के अलावा घर के काम, खेत के काम और पशुओं की सार संभाल में पूरा सहयोग करते थे. उनके परिजन बताते है कि बोयतराम बेहद सादा खाना खाते थे, इसलिए वे स्वस्थ रहे और अपने काम के अलावा घर के काम में सहयोग करते थे. बता दें कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब बोयतराम मेडल लेकर वापस स्वदेश लौटे तो वे महात्मा गांधी और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले थे. बोयतराम अपने पीछे के 2 बेटे धर्मवीर और मुकंदाराम और 4 पोते धर्मवीर, सत्‍यप्रकाश, मुकेश व सुरजीत को छोड़ गए हैं. उनकी धर्मपत्‍नी चंदा देवी भी 92 वर्ष की हैं और सेहतमंद हैं. 


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