सीखने की सीढ़ियां

प्रभात कुमार: यह भी समझाया जाता है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। इंसान कभी भी, कहीं से भी, किसी से भी सीख सकता है। मन की कोमलता, सरलता और सहजता ऐसी होती है कि सीखे हुए में से जितना भी आत्मसात कर सकें, कर लेने में फायदा है। माना कि जीवन में संघर्ष कम नहीं है, मगर आंतरिक जीवन जितना सुधरेगा, संघर्ष उतना ही कम परेशान करेगा। भौतिक इच्छाएं और वस्तुएं बाधा बनती हैं, लेकिन एक बार दृढ़ निश्चय कर लिया जाए तो सब आसान लगता है।

बच्चों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनकी सीख में अभिनय नहीं होता। उनके निर्मल मन से निकल रही भावनाओं का सहज प्रेषण हमारे हृदय को छूकर पुलकित कर देता है। पहली आधारभूत सीख बचपन हमें आत्मविश्वास बनाए रखने की देता है। बच्चों को जो भी अच्छा लगता है, वह काम कितना भी मुश्किल हो, करने में लग जाते हैं। उनके दिमाग में कभी यह तुलनात्मक विचार नहीं आता कि सफल होंगे या असफल। वे कर्म के रास्ते पर जुटे रहते हैं। मित्रता करनी सीखनी हो तो बचपन से बेहतर आंगन नहीं हो सकता।
बच्चे जाति-धर्म, अमीर-गरीब या सामाजिक स्तर देखे बिना, अपने फायदे-नुकसान का गणित लगाए बिना खुले मन से निस्वार्थ दोस्ती करते हैं। वे अपने मित्रों को वे जैसे हैं, वैसा स्वीकार करते हैं। उनके बीच भी बचपन की स्वाभाविक परेशानियां रहती हैं। कभी मतभेद न सुलझे, उलझने की नौबत आए और झगड़ा हो जाए तो लड़ने के कुछ देर बाद माफी देकर और लेकर फिर दोस्ती का हाथ मिला लेते हैं।
बच्चे अपने साथियों के साथ खुलकर भावनाएं प्रकट करते हैं। फूलों की तरह मुस्कुराते, खूब जोर लगाकर हंसते और खिलखिलाते हैं। खालिस निश्छल हंसी के तो वे उस्ताद होते हैं। बचपन में उन्हें यह भी पता नहीं होता कि किसे नाम लेकर पुकारना है, किसे नहीं। ‘नानू का नाम नहीं लेते’ या फिर बच्ची बोलती है कि ‘मैं अभी जाता हूं’, तो उसे अभिभावक ही सिखाते हैं कि ‘मैं अभी जाती हूं’ बोलो।
जीवन की जिन परिस्थितियों, कमियों या अनुभव की संकरी गलियों से माता-पिता गुजर चुके होते हैं, उनके बच्चों के रोम-रोम में वही सब कुछ समाया होता है। इसीलिए संतान को उनका आईना या प्रतिबिंब कहा जाता है। कुछ ऐसे सवाल जो हमारे जीवन में जवाब रहित रह जाते हैं, बच्चे हमसे पूछते हैं और जब हम उनके पारदर्शी सवालों के जवाब अपने जीवन अनुभवों, परिस्थितियों के मुताबिक घुमा-फिराकर, सांसारिक, बाजारी ढांचे में देते हैं तो वास्तव में हम उनसे छल कर रहे होते हैं।
यहीं बचपन अपनी मासूमियत खोना शुरू करता है और हम सीखना नहीं, सिखाना शुरू कर चुके होते हैं। एक तरह से हम उन्हें तैयार कर रहे होते हैं कि जीवन मंच पर बड़े होते हुए उन्हें कैसे जीना है। माहौल में फंसी विवशता के कारण उन्हें यह सब सीखना ही होता है। धीरे-धीरे उनका मन उन विचारों को बिना विश्लेषण किए आत्मसात कर रहा होता है। यहीं बचपन का बचपन छूटना शुरू हो जाता है। वे अच्छा सिखाना नहीं, व्यावहारिक सीखना शुरू कर देते हैं।
वास्तव में बच्चे ईमानदार और वास्तविक जिज्ञासु होते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि उनकी इस बात का क्या असर होगा, कोई क्या सोचेगा। अपनी सभी बातें बेबाकी से सबके सामने रख देते हैं। जबकि ऐसा करना बड़ों के लिए मुश्किल होता है, क्योंकि उन्हें इस जीवन और दुनिया के नियम और शर्तों का पालन करना होता है। दरअसल, हम बच्चों से वही कुछ सीखने के उपदेश देते या लेते हैं जो आज की दुनिया में वास्तव में चलन में नहीं है।
यहां व्यावहारिक सवाल यह है कि हम उन्हीं बच्चों से सीखने की सीख देते या लेते हैं, जिन्हें हम पैदा होते ही इशारों-इशारों में कुछ न कुछ बता या सिखा रहे होते हैं। उनके होश संभालते ही हम उन्हें जरूरी भाषाओं के वर्ण सिखाना शुरू कर देते हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा जल्दी से विद्वान विद्यार्थी में तब्दील हो जाए। बच्चे को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देते हैं। कहा यह जाता है कि लालन-पालन पर सब कुछ निर्भर करता है, लेकिन क्या हम सचमुच सृष्टि द्वारा बच्चे के दिमाग में रोपित समग्र नैसर्गिकता को संचित कर रहे होते हैं? शायद नहीं। बच्चा सीख कुछ और रहा होता है और देख कुछ और। हमें उसे अपरिपक्व समझते हैं, लेकिन वास्तव में वह काफी कुछ समझ रहा होता है।
जीवन जीने का सूत्र यह भी है कि हर इंसान के भीतर एक बच्चा है, जिसे जीवित रखना चाहिए। इसके लिए हमें बचपन से सीखना चाहिए, ताकि आत्मविश्वास, मित्रता, बदलाव, सवाल पूछना, भावनाएं प्रकट करना जैसे जीवन मंत्र वास्तव में अपनाकर, सकारात्मक बदलाव लाने में मदद मिले। संभव है इस बहाने कुछ बिंदासपन और बेफिक्री भी आए।
क्रेडिट : jansatta.com