
बैजनाथ। ऐतिहासिक शिव मंदिर बैजनाथ में मकर संक्रांति के पावन पर्व के चलते घृतमंडल बनाने का कार्य आरंभ हो गया। इस बार करीब तीन क्विंटल घी को पिघला के उसे निर्मल शीतल जल में अनेक बार धो कर उसे मक्खन बनाने का कार्य शिव मंदिर के पुजारियों द्वारा किया जा रहा है । उस मक्खन को 14 जनवरी बाद दोपहर भोलेनाथ की विधिवत पूजा-अर्चना के उपरांत मंदिर के पुजारियों द्वारा घृतमंडल बनाने का कार्य शुरू कर दिया जाएगा। बाद में उस घृतमंडल को सूखे मेबों, फल-फूलों से सजाया जाएगा। यह घृतमंडल रात्रि तक तैयार हो जाएगा व अगले सात दिनों तक भगवान भोलेनाथ इसी रूप में अपने भक्तों को दर्शन देंगे। 21 जनवरी को घृत मंडल को सुबह की आरती के बाद उतार कर प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को बांटा जाएगा, जिसे लोग पूरा साल समृद्धि के रूप में संभाल कर रखते हैं तथा इसका उपयोग चर्म रोग को ठीक करने केे लिए करतेे हैं। घृतमंडल पर्व पर मंदिर के गर्भ की सजावट प्राकृतिक फूलों से की जाएगी। मंदिर को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जा रहा है।
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बैजनाथ शिव मंदिर में घृतमंडल पर्व की ऐसी है मान्यता। मकर संक्रांति पर देशी घी का लेप किए जाने को लेकर अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं, वहीं चिकित्सकों की मानें, तो सात दिन तक पवित्र शिवलिंग पर लेप होने व 108 बार ठंडे पानी से धोने व मेवों के साथ रहने के कारण से यह घी औषधी का रूप धारण कर लेता है और चर्म रोगों के निवारण के लिए सहायक रहता है, वहीं कुछ चिकित्सकों का मानना है कि यह मक्खन बतौर मॉइश्चराइजर के काम आता है। चर्म रोगों पर लगाना केवल भगवान के प्रति आस्था है। मंदिर पुजारी सुरिंद्र आचार्य के अनुसार मंडी रियासत के राजा चंद्र सेन ने भगवान शिव के दर्शन किए और उनके मन में शिवलिंग को मंडी ले जाने की इच्छा पैदा हुई । राजा चंद्रसेन ने इच्छापूर्ति के लिए भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया और इस दौरान राजा अचेत हो गए। अचेत स्थिति में राजा को सपना आया कि ऐसा करने पर उसकी रियासत का विनाश हो जाएगा। इसका प्रायश्चित करने के लिए राजा ने हर वर्ष एक मन घी से लेप करने का वचन दिया। सात दिनों तक चलने वाले इस पर्व पर ऐतिहासिक बैजनाथ शिव मंदिर में भारत वर्ष के कोने-कोने से शिव भक्तों का आने का तांता लगा रहता है।