उत्तर प्रदेश

अकबरनगर के लोगों के साथ खड़े हों!

शांतम निधि

अकबरनगर। यह वह ऐतिहासिक तारीख है जब मंगल नाम का एक व्यक्ति अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ बगावत करता है जिसका वह एक सिपाही था। इसी तरह एक और ऐतिहासिक तारीख है 21 दिसम्बर 2023। इस दिन भी मंगल नाम के एक व्यक्ति ने कथित लोकतांत्रिक साम्राज्य के खिलाफ बगावत कर दी जिसका वह एक सिपाही है। ऐतिहासिक तारीखों की बात हो रही है तो इतिहास की भी होनी चाहिए।

भारत का इतिहास साम्राज्यवाद से संघर्ष का इतिहास है। आज साम्राज्य ‘लोकतान्त्रिक’ सरकार के रूप में अपने लोगों को ही विस्थापित कर रहा है। जल, जंगल, ज़मीन की लड़ाई पूरे देश में लड़ी जा रही है। पूंजीपतियों के लिए ज़मीन अधिग्रहण करते-करते सरकार माफिया बन गई है । और 21 दिसम्बर 2023 को यह लड़ाई लखनऊ के अकबरनगर तक पहुँच गई।

उस दिन सुबह अकबरनगर के घरों और दुकानों पर लाल निशान लगा हुआ था। मतलब इन पर खतरा है या इनसे खतरा है। जबकि इनके वजूद के लिए खतरा पैदा कर दिया गया। और इसे बचाने के लिए लाल झंडे वालों का कोई अता-पता नहीं था। मैं खुद भी लाल झंडे वाला हूं और अपनी नाकामी बताए बिना यह कहानी पूरी नहीं कर पाऊंगा। प्रशासन और पुलिस ने घेराबंदी करके अकबरनगर को 2 घंटों में नजरबंद कर दिया। वहां पहुंच गया पीले रंग का बुलडोज़र। गांधी जी ने ‘चरखा’ को आजादी का प्रतीक बनाया था। ‘तिरंगा’ लोकतंत्र का प्रतीक बना। वहीं ‘बुलडोजर’ फासीवाद का प्रतीक बन गया है। यही बुलडोजर अकबरनगर पहुंच गया। यहां के वासियों को 100 साल पीछे ले जाने के लिए तैयार था।

अकबरनगर के लोग अपने घरों-दूकानों को बचाने के लिए रोड पर निकल पड़े। उनके पहने कपड़े वहीं थे जो इस देश में पहने जाते हैं। अकबरनगर के लोगों को आप क्या प्रधानमंत्री भी कपड़ों से नहीं पहचान पाएंगे क्योंकि उन आम कपड़ों की भीड़ में एक रंग भगवा भी था। अकबरनगर के मुस्लिमों के बीच रहता एक मंगल भी था। लेकिन भगवे रंग का यह कार्यकर्ता अपनी ही सरकार के विरोध में क्यों था? इसका जवाब बहुत ही मामूली था। मंगल को अपना और अपने पड़ोसियों का घर बचाना था।

आखिर अकबरनगर के लोगों को विस्थापित क्यों किया जा रहा है? यहां सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 15,000 लोग रहते हैं, और वे 40-50 सालों से यहां निवास कर रहे हैं। तो एकदम से सरकार 15,000 लोगों के घर क्यों तोड़ना चाहती है? सुना है अकबरनगर के बगल से जो नाला गुजरता है, 6 महीने पहले उसे नदी घोषित कर दिया गया था। अकबरनगर के लोगों के घर तोड़कर उनकी संपत्ति छीनकर उन्हें भगाया जा रहा है। प्रचार किया गया कि यह सब उनकी ही भलाइ के लिए किया जा रहा है। हिंदूत्ववादी सरकार के एक ज्योतिषी की घोषणा है कि अकबरनगर के बगल से गुजरने वाला नाला बाढ़ के इंतजार में है। यह बाढ़ में डूब जाएगा। यह बाढ़ तो आज तक आई नहीं और उसके आने से पहले कहा गया कि अकबरनगर के लोगों को अपनी तीन पीढ़ियों द्वारा बनाए गए घर छोड़कर, 5 लाख का क़र्ज़ा लेकर, सरकारी घर लेना चाहिए, वहां चले जाना चाहिए।

सच्चाई तो यह है कि अकबरनगर के लोगों से ज़्यादा कीमत उस ज़मीन की है जिसपर वे रह रहे हैं। इस बात की पुष्टि हो जाएगी अगर अकबरनगर से 2-3 किलोमीटर आगे जाकर देखें कि “बाढ़ अधिकृत” नाले को सरकार और ज़्यादा “बाढ़ अधिकृत” कैसे बना रही है। कॉन्क्रीट के पाइप लाए जा रहे हैं और इंतजाम किया जा रहा है कि नाले का सारा पानी उनसे निकले। पाइप के ऊपर मिट्टी डालकर ज़मीन को समतल बनाया जा रहा है और उस ज़मीन को तोहफे की तरह भेंट देने के लिए तैयार किया जा रहा है। तोहफा किसके लिए है, यह अब तक किसी को नहीं पता। पर सरकार को पता है। यह कोई नई बात नहीं है। गरीब – गुरबा और आम लोगों को ऐसे ही उजाड़ा जाता है और वहां धनपशुओं की अट्टालिकाएं खड़ी होती रही हैं। क्या अकबरनगर में वही कहानी दोहराई जाएगी?

अगर हमारा लोकतंत्र सच्चा है तो सरकार लोगों की होनी चाहिए। और अगर सरकार लोगों की है तो सरकारी ज़मीन भी लोगों की ही होनी चाहिए। लेकिन सरकार “अपनी” ज़मीन से अकबरनगर के लोगों को हटा कर बाहर करना चाहती है। अकबरनगर के लोग सरकार से बात करना चाहते हैं। लेकिन उनकी नज़र में वहां के बाशिन्दे “नाले के कीड़े” हैं। अकबरनगर की ज़मीन तैयार है और तैयार हैं वहां के लोग अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए। वे धनपशुओं का आहार बनने को तैयार नहीं हैं। हमारी अपील है लोकतंत्र और हक-हकूक के लिए लड़ने वाले नागरिक समाज और जन संगठनों से कि वे अकबरनगर के लोगों के साथ खड़े हों!


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